शुक्रवार, 24 जुलाई 2015

गुरु दत्त



फिल्मों के देखने, जानने और थोड़ा बहुत समझने के काफी अरसे बाद मैंने गुरु दत्त को जाना। जब जाना, तो इस जान-पहचान को और बढ़ाने का मन किया। इसलिए उनकी फिल्में देखीं। जितना ज्यादा जाना उतना ही ज्यादा उनकी कला और हुनर की अहमियत समझ आती गई। इसी सफर में नसरीन मुन्नी कबीर की लिखी एक किताब 'गुरु दत्त- हिंदी सिनेमा का कवि' हाल में पढ़ी है। इसी किताब से कुछ दिलचस्प बातें-


हवा में जोर से उड़ते परदे, शरद ऋतु में पत्तियों की अंतिम फड़फड़ाहट की तरह हवा में उड़ते कागज, छाया और प्रकाश में रहस्यमय तरीके से एकांत में  चलता व्यक्ति ...

ऐसा चित्रण अनगिनत व्यक्तियों को झकझोरता रहा है।
यही वजह है शायद कि मृत्यु के तीस साल बाद भी गुरु दत्त की कला एक जीवित शक्ति से ज्यादा रही।


वास्तव में भारतीय सिनेमा में उनके योगदान की पूरी पहचान सन् 1964 के कुछ वर्षों के बाद ही हुई। 'प्यासा' देखने के बाद एक अमेरिकी विद्धान ने टिप्पणी की थी - 'यदि गुरु दत्त का काम उनके जीवनकाल में ही विश्वविख्यात होता तो उनकी गिनती भी डगलस पार्क और बिली विल्डर जैसे व्यक्तियों में होती।'

1925 के जुलाई माह में बरसात के मौसम में बैंगलोर में गुरु दत्त का जन्म हुआ था।
उनका नाम गुरु दत्त होने के पीछे वजह थी कि उनका जन्म गुरुवार के दिन हुआ था, जो कि गुरु का दिन होता है। इसलिए उनके मामा ने उनका नाम

गुरु दत्त रखा। वैसे उनका असल नाम शिवशंकर पादुकोण था।

सोलह साल की उम्र में गुरु दत्त को अपनी पहली नौकरी एक टेलीफोन ऑपरेटर के तौर पर मिली थी। उनकी मासिक तनख्वाह 40 रुपये थी। आत्माराम और ललिता उनके भाई और बहन को याद है कि गुरु दत्त ने अपनी इस पहली तनख्वाह से अपने पूरे परिवार के लिए तोहफे खरीदे थे।


शुरुआत में नृत्य के प्रति रुझान उन्हें अल्मोड़ा उदय शंकर की डांस अकेडमी ले गया।
फिर फिल्म बनाने की चाह उन्हें प्रभात स्टूडियो ले गई।
लेकिन एक समय ऐसा भी आया जब उन्हें लगा कि आज की भौतिकतावादी जिंदगी में एक कलाकार की कीमत कितनी कम थी और कैसे एक रचनात्मक दिमाग को संतुष्ट करने के लिए व्यक्तिगत प्रतिभा ही काफी नहीं होती। उन अवसादपूर्ण दिनों में, बंटवारे के कुछ दिनों बाद, गुरु दत्त ने 'प्यासा' का पहला ड्राफ्ट लिखा।
शुरुआत में इसका नाम 'कशमकश' रखा गया था।


एक बार गीता बाली की बहन ने गुरु दत्त से कहा, 'आप क्यों नहीं अभिनय करते।'
वह कभी मानते न थे कि वह अभिनय कर सकते हैं। वह चाहते भी न थे। 'आर-पार' के लिए शम्मी कपूर को लेने की काफी कोशिश की गई औऱ 'मिस्टर एंड मिसेज 55' के लिए सुनील दत्त का कैमरा टेस्ट भी लिया गया।
सभी इंतजाम होने के बाद गुरु दत्त बेचैन हो जाते थे। उपयुक्त नायक न मिलने पर वह खाली तो नहीं बैठ सकते थे, इसलिए उन्होंने स्वयं ही अपनी फिल्मों में काम करने का निश्चय किया। इसलिए उन्होंने 'बाज' फिल्म में अभिनय किया।


-कई पटकथा लेखकों के साथ काम करने के निराशाजनक अनुभव के बाद सौभाग्य से उनकी मुलाकात अबरार अल्वी से हुई। अल्वी नागपुर से थे और उन्होंने कानून की शिक्षा प्राप्त की थी। वह नागपुर से मुंबई अभिनेता बनने की इच्छा लेकर आए थे। अल्वी के रिश्ते के भाई ने अल्वी का परिचय राज खोसला से करवाया। जब राज ने जाना कि अल्वी एक अच्छे लेखक हैं, तो उन्होंने उनसे 'बाज' के संवादों को पुन लिखने को कहा। गुर दत्त उनके कम से प्रसन्न हुए और आगे की फिल्म 'आर-पार' में उनके साथ काम करने को कहा।
गुरुदत्त के काम में अबरार अल्वी का सहयोग आसानी से आंका नहीं जा सकता। कई दिनों और महीनों तक साथ रहने के कारण समय के साथ उनकी

दोस्ती बढ़ती गई। आखिरकार गुरु दत्त को एक ऐसा लेखक मिल गया, जो सिनेमा के माध्यम को समझता था। 40 के दशक की कई फिल्मों के अधिकतर पात्र चाहे वह राजा हो या सामान्य व्यक्ति, एक ही शैली में बात करते हुए देखे जा सकते हैं। अल्वी की यही खासियत थी कि वे अपने पात्रों को एक विशिष्ट पहचान दे सके। उनके प्रत्येक पात्र के संवाद उसके समाज तथा क्षेत्रीयता की पहचान दिलाते थे।



गुरु दत्त को उनके जानने वाले आज भी याद करते हैं उनकी अनिश्चितता को लेकर, चंचल मन को लेकर, बार-बार शूटिंग करने की आदत को लेकर।


30 अक्तूबर 1964 को  उनके निधन पर फिल्मफेयर ने एक ऐसा लेख छापा, जिसका शीर्षक था- खुदा, मौत और गुलाम,     कैफी आजमी ने गुरु दत्त की याद में एक कविता लिखी, जिसे इसके अग्रलेख में छापा गया-

'रहने को सदा दहर में आता नहीं कोई,
तुम जैसे गए ऐसे भी जाता नहीं कोई।'


किताब में शामिल गुरु दत्त के लिखे एक लेख का अहम अंश

अगर साहित्य, काव्य या चित्रकला को पैसों के लिहाज से उचित पुरस्कृत नहीं किया जाता या नहीं पहचाना जाता तो यह अधिकतर उन लोगों की प्रवृत्ति  को दर्शाता है, जिन्हें उसका दायित्व उठाना चाहिए, न कि उस महान तपस्वी का, जिसने उसकी रचना की है। यही सच्चाई फिल्म के साथ भी है। अगर वह सचमुच में क्लासिक फिल्म है, पर अपेक्षित कमाई नहीं करती, तो उसका दोष पूरी तरह से रचनाकार पर नहीं मढ़ा जाना चाहिए। इसका अर्थ यह है कि वित्तीय सफलता व विफलता अक्सर दर्शकों की सौंदर्यानुभूति की क्षमता, बौद्धिक स्तर तथा उनकी इच्छाओं- आकांक्षाओं आदि बाहरी तत्वों पर निर्भर रहती है।
कई शताब्दियों से गौरव ग्रंथों के रचनाकार लीक से हटकर चलने और वर्तमान चलन से ऊपर उठने के दुःसाहस का दंड भोगते रहे हैं। आइए हम कुछ उदाहरण देखें-

कहा जाता है कि महान कवि होमर को अपने जीवनकाल में भीख मांगनी पड़ी। उन सात नगरों ने होमर को मृत घोषित किया, जहां जीवित होमर जीने के  लिए भीख मांगते थे।
गोल्ड स्मिथ को विकार ऑफ वेकफील्ड की पांडुलिपि की पांडुलिपि को अपना किराया भरने के लिए बेचना पड़ा। जॉनसन ने रसेल्स लिखकर अने परिवार के एक सदस्य के अंतिम संस्कार का खर्चा पूरा किया।
वान गॉग को रंग खरीदने के लिए कई सप्ताहों तक भूखा रहना पड़ा- अपनी पेंटिंग सूरजमूखी के फूल को कैनवास पर उतारने के लिए।
अपने ही देश में रामायण के रचनाकार तुलसीदास को आर्थिक संकटों से गुजरना पड़ा।
काव्यमयी महानता के बावजूद कबीर को अंत तक एक गरीब जुलाहे की तरह रहना पड़ा।
नरेश मेहता को जिन्होंने वैष्णव जन जैसे कालजयी गीत लिखे, को अपने सबसे पसंदीदा राग केदार को गिरवी रखना पड़ा अपने घरेलू जीवन का ऋण चुकाने के लिए।

सोमवार, 11 मई 2015

दो बाल्टी पानी

रात हुई
बिस्तर सजा
आंखें बंद की
पहले नींद आई
फिर सपने आए
फिर सुबह हुई।

फिर

रात हुई
बिस्तर सजा
आंखें बंद की
पहले नींद आई
फिर सपने आए
फिर सुबह हुई।


ऐसा ही होता रहा
कई बरसों तक
सपने आकर जाते रहे
कुछ सच हुए
कुछ बस सताते रहे

मगर
एक दिन जब

रात हुई
बिस्तर सजा
आंखें बंद की
तो न नींद आई
न सपने आए

क्योंकि उस रोज
सपना दिन में ही देख लिया था
मैंने देखा था अपनी आंखों से
राजस्थान के एक गांव में रहने वाली 

लड़की की आंखों में तैरते सपने को
वो 

एक दिन 
दो बाल्टी पानी से नहाना चाहती थी।





रविवार, 19 अप्रैल 2015

खबर कहती है

आकाश चुप है
धरती चुप

जंगल चुप है
समंदर चुप

खेत भी चुप हैं, बाग भी
महल भी और किले भी हैं चुप

हवा भी चली चुपचाप ही
चुप्पी साधे बर्फ भी पिघल रही है न जाने कब से

मगर खबरों में बहुत शोर है इस चुप्पी का

खबर कहती है- जंगल कट रहे हैं
फिर जंगल से चीखने की आवाज क्यों नहीं आती

खबर कहती है- समंदर मैला हो रहा है
फिर समंदर क्यों नहीं छीन लेता हमसे उसे देखने का सुकून

खबर कहती है- धरती बंजर हो रही है, खेत सूख रहे हैं
फिर मिट्टी इनकार क्यों नहीं कर देती बीज को अपनाने से

खबर कहती है- महल और किलों की दीवार रंगी जा रही है अपशब्दों और अश्लील चित्रों से
फिर क्यूं नहीं कर देते ये महल और किले एलान-ए-जंग

खबर कहती है- हवा में घुल रहे हैं हानिकारक तत्व
फिर हवा चल क्यों रही है
मना क्यों नहीं कर देती चलने से

फिर क्यूं...
आकाश चुप है
धरती भी चुप

क्यों
जंगल चुप है
समंदर चुप

क्यों
खेत और बाग चुप हैं
और क्यों महल किले चुप

क्यों
हवा भी चुपचाप चले जा रही है और
क्यों
बर्फ की चुप्पी टूटती नहीं

क्यों?

शनिवार, 29 नवंबर 2014

तीन ब‌िंद‌िया

कभी बातों से पहले
और कभी बाद में दर्ज होती हैं
वो जो तीन ब‌िंदियां
असंख्य शब्द छिपे होते हैं उनमें
और 
सैंकड़ों भावनाएं
लाखों फलसफे
करोड़ों अफसाने भी हो सकते हैं 
आप स्वतंत्र हैं चुनने के ल‌िए 
जो चाहें।

शनिवार, 11 अक्तूबर 2014

अलहदा




इन कविताओं को एक साथ पोस्ट करना खुद को
 एक कलाकार जैसा महसूस करना है।
विकल्प

विकल्पहीनता
को कभी गहराई से महसूस करके देखना
इससे सुखद अहसास नहीं मिलेगा
विकल्पों की इस भीड़ में।


तुम

तुम्हें समंदर की तरह होना चाहिए था
मगर तुम पहाड़ जैसे थे
मैं नदी नहीं बन सकी
दरिया ही रही
समंदर में जा मिलना ही
शायद नसीब था मेरा।


लिखना

जीती हूं तो लिखती हूं
लिखती हूं तो जी लेती हूं
डरती हूं मगर
लिखने को जुर्म न करार दे दे कहीं
उसकी अदालत।


राजनीति

अब से
मेरी भी अपनी एक राजनीति है
मैं राज को राज रखकर
नीतियों को नींद की गोली खिलाकर
खुद को जगाना चाहती हूं जीने के लिए।


अंधेरा

अंधेरे का होना
रोशना का न होना नहीं है
अंधेरे का होना
अंधेरे का ही होना भी नहीं है
अंधेरे का मतलब
आंखों को कुछ समझ ना आना है
बस।



समर्पण

मेरा हर समर्पण बेकार था
क्योंकि
मैं अपना

शरीर सौंपने में
हिचकिचाई थी जरा।



सोमवार, 8 सितंबर 2014

कब हटेगा कोहरा, कब छटेगी धुंध


मौन
असंख्य शब्द आ और जा चुके हैं
तुम्हारे और मेरे बीच
मगर फिर भी हम वह नहीं कह सके
जिसके बाद मौन भी एक भाषा बन जाता है


बंदिशें
न जाने बंदिशों की कैद में हू मैं
या मेरे ही मन ने कैद कर लिया है बंदिशों को
अपनी परवाह नहीं रही अब
चाहती हूं कि
ये बंदिशें आजाद हों


संभावना
कहीं कुछ रहे न रहे
कोरे कागज पर हमेशा
शेष रहेंगी
संभावनाएं।


संवेदना
इच्छाओं के बाजार में
सरेआम
बेहद गिरे हुए दामों पर
बेची जा चुकी हैं संवेदनाएं
दिखाने और जताने को हैं सिर्फ सिसकियां
आह...
ओह...
ओहो...
आदि-आदि।


शुक्रवार, 4 जुलाई 2014

मेरे समय की औरत

[ फेम‌िन‌िज्म या नारीवाद मेरे ल‌िए बेहद असहज कर देने वाले शब्द हैं। मेरा ‌इन शब्दों से कोई वास्ता नहीं है। मुझे ये मानने में भी कोई गुरेज नहीं है ‌क‌ि औरत और आदमी के बीच फर्क है। औरत और आदमी एक बराबर नहीं है। मगर बावजूद इसके औरतें आदम‌ियों की इस दुु‌न‌िया में अपनी जगह बना रही हैं बराबरी के साथ ये अच्छी और गौर करने वाली बात है। इसी मुद्दे पर एक बार ‌क‌िसी ने पूछा था क‌ि अपने समय की औरत को कैसे च‌ित्र‌ित करोगी तो इस तरह कुछ ‌ल‌िखा था-----]



मेरे पास एक कहानी है। इस कहानी में दो किरदार हैं। पहला किरदार है एक लड़की और दूसरा किरदार निभा रहे हैं कुछ दूसरे लोग। 

कहानी कुछ यूं है- 

घर-परिवार की उम्मीदों पर पानी फेरते हुए वह लड़की जन्म ले चुकी है। लड़की होने की पहली सजा उसे ये मिली है कि उसके पैदा होने की खुशी में खुश होने वाला सिवाय उसकी मां के कोई नहीं है। मां खुश है क्योंकि वह मां बन गई है। वह अपनी बेटी को प्यार करती है। उसे हर वो खुशी देने की कोशिश करती है, जो उसे नहीं मिली। ‘’जमाना बदल रहा है। लड़का और लड़की में क्या फर्क करना।‘’ मां ये बात अच्छे से समझती है। मां कभी ये नहीं कहती कि काश मेरा एक बेटा होता। पिता को हमेशा ये अफसोस रहता है कि वह एक बेटे के बाप नहीं बन सके। इन्हीं विरोधाभासों में लड़की बड़ी हो रही है। मां की छाया और बाप की बंदिशों ने उसे लड़की की तरह रहना तो सिखा दिया है मगर वह जीना अपनी तरह चाहती है। 
उसे कुछ बनना है। 
वह खूब पढ़ना चाहती है।
अपने पैरों पर खड़े होना चाहती है।
 नाम कमाना चाहती है।
 पैसा कमाना चाहती है। 
दुनिया की सैर करना चाहती है।
 वह किसी को बेइंतहा मोहबब्त करना चाहती है।
 वह जीना चाहती है अपनी तरह...
उसने शुरुआत कर दी।


वह पढ़ने गई। 
कॉलेज से घर के रास्ते में कुछ अवारा लड़के उसके पीछे लग गए। कॉलेज छुड़वा दिया गया।

वह नौकरी करने लगी। 
बॉस ने उसे गलत नजरों से देखना शुरू कर दिया। नौकरी छोड़ दी गई।

उसे एक लड़के से प्यार हो गया। 
लड़के ने उसके प्यार का फायदा उठाकर उसके साथ जबरदस्ती की। प्यार पर पछता लिया गया।

उसकी शादी कर दी गई। 
उसके पति ने बिना उसके मन और मर्जी को अहमियत दिए उसके शरीर पर अपना हक जमा लिया। उसे आदत हो गई। 

जिंदगी उसकी चाहतों से कहीं दूर निकल चुकी थी। मगर कुछ था उसके पास जो उसे गाहे-बगाहे फिर-फिर उन चाहतों के किनारे पर पहुंचा दिया करता था। वह दुनिया और समाज के तौर-तरीकों पर चलकर देख चुकी थी। उसने अपने तौर तरीके बनाने शुरू किए। 
ये एक नई लड़की का जन्म था। 

उस लड़की ने पढ़ाई शुरू की।
रास्ते में पीछा करने वालों को गाली बकी और चप्पल उतार कर भी मारी। और एक दिन उन्हीं लड़कों ने उसके मुंह पर तेजाब फेंक दिया।

वह नौकरी करने लगी। 
बॉस ने उसे गलत नजरों से देखा तो उसने साफ-साफ कह दिया कि वह अपनी नजरें सही करे। उसे नौकरी से हाथ धोना पड़ा।

वह पूरे मन से एक लड़के से प्यार करने लगी। 
लड़का उसके शरीर से प्यार करना चाहता था। उसने विरोध किया। उसका बलात्कार कर लिया गया। 

उसकी शादी कर दी गई। 
उसके पति ने जब हर दिन बिना उसके मन और मर्जी को अहमियत दिए उसके शरीर पर अपना हक जमाना शुरू कर दिया तो उसने एक दिन अपने पति से कहा कि उसका मूड नहीं है। पति ने उसे बेवफा समझ लिया।


अब वही लड़की एक बार फिर नया जन्म ले रही है।
मर्दों की बुरी नजर ने उसे बेशक मजबूर कर दिया है कि वे उन्हें नजरअंदाज करे।
तेजाब से झुलसे चेहरे की आग में वह बेशक आज भी जल रही है। 
बेशक बलात्कार ने उसके शरीर ही नहीं आत्मा को भी झकझोर दिया है।
और यह बात भी साफ है कि परिवार और पति के बेवजह के तानों ने उसके दिल को चकनाचूर कर दिया है। 

मगर वह हारेगी नहीं। टूटेगी नही। छिपेगी नहीं, न ही छिपने देगी। वह सामने आएगी और सामने लाएगी उन्हें जिन्होंने उसके वजूद पर बार-बार प्रहार किया है। 

मेरे ख्याल में यही है मेरे समय की औरत
हमारे समय की औरत 
बनती हुई औरत
बढ़ती हुई औरत