सोमवार, 11 मई 2015

दो बाल्टी पानी

रात हुई
बिस्तर सजा
आंखें बंद की
पहले नींद आई
फिर सपने आए
फिर सुबह हुई।

फिर

रात हुई
बिस्तर सजा
आंखें बंद की
पहले नींद आई
फिर सपने आए
फिर सुबह हुई।


ऐसा ही होता रहा
कई बरसों तक
सपने आकर जाते रहे
कुछ सच हुए
कुछ बस सताते रहे

मगर
एक दिन जब

रात हुई
बिस्तर सजा
आंखें बंद की
तो न नींद आई
न सपने आए

क्योंकि उस रोज
सपना दिन में ही देख लिया था
मैंने देखा था अपनी आंखों से
राजस्थान के एक गांव में रहने वाली 

लड़की की आंखों में तैरते सपने को
वो 

एक दिन 
दो बाल्टी पानी से नहाना चाहती थी।





रविवार, 19 अप्रैल 2015

खबर कहती है

आकाश चुप है
धरती चुप

जंगल चुप है
समंदर चुप

खेत भी चुप हैं, बाग भी
महल भी और किले भी हैं चुप

हवा भी चली चुपचाप ही
चुप्पी साधे बर्फ भी पिघल रही है न जाने कब से

मगर खबरों में बहुत शोर है इस चुप्पी का

खबर कहती है- जंगल कट रहे हैं
फिर जंगल से चीखने की आवाज क्यों नहीं आती

खबर कहती है- समंदर मैला हो रहा है
फिर समंदर क्यों नहीं छीन लेता हमसे उसे देखने का सुकून

खबर कहती है- धरती बंजर हो रही है, खेत सूख रहे हैं
फिर मिट्टी इनकार क्यों नहीं कर देती बीज को अपनाने से

खबर कहती है- महल और किलों की दीवार रंगी जा रही है अपशब्दों और अश्लील चित्रों से
फिर क्यूं नहीं कर देते ये महल और किले एलान-ए-जंग

खबर कहती है- हवा में घुल रहे हैं हानिकारक तत्व
फिर हवा चल क्यों रही है
मना क्यों नहीं कर देती चलने से

फिर क्यूं...
आकाश चुप है
धरती भी चुप

क्यों
जंगल चुप है
समंदर चुप

क्यों
खेत और बाग चुप हैं
और क्यों महल किले चुप

क्यों
हवा भी चुपचाप चले जा रही है और
क्यों
बर्फ की चुप्पी टूटती नहीं

क्यों?

शनिवार, 29 नवंबर 2014

तीन ब‌िंद‌िया

कभी बातों से पहले
और कभी बाद में दर्ज होती हैं
वो जो तीन ब‌िंदियां
असंख्य शब्द छिपे होते हैं उनमें
और 
सैंकड़ों भावनाएं
लाखों फलसफे
करोड़ों अफसाने भी हो सकते हैं 
आप स्वतंत्र हैं चुनने के ल‌िए 
जो चाहें।

शनिवार, 11 अक्तूबर 2014

अलहदा




इन कविताओं को एक साथ पोस्ट करना खुद को
 एक कलाकार जैसा महसूस करना है।
विकल्प

विकल्पहीनता
को कभी गहराई से महसूस करके देखना
इससे सुखद अहसास नहीं मिलेगा
विकल्पों की इस भीड़ में।


तुम

तुम्हें समंदर की तरह होना चाहिए था
मगर तुम पहाड़ जैसे थे
मैं नदी नहीं बन सकी
दरिया ही रही
समंदर में जा मिलना ही
शायद नसीब था मेरा।


लिखना

जीती हूं तो लिखती हूं
लिखती हूं तो जी लेती हूं
डरती हूं मगर
लिखने को जुर्म न करार दे दे कहीं
उसकी अदालत।


राजनीति

अब से
मेरी भी अपनी एक राजनीति है
मैं राज को राज रखकर
नीतियों को नींद की गोली खिलाकर
खुद को जगाना चाहती हूं जीने के लिए।


अंधेरा

अंधेरे का होना
रोशना का न होना नहीं है
अंधेरे का होना
अंधेरे का ही होना भी नहीं है
अंधेरे का मतलब
आंखों को कुछ समझ ना आना है
बस।



समर्पण

मेरा हर समर्पण बेकार था
क्योंकि
मैं अपना

शरीर सौंपने में
हिचकिचाई थी जरा।



सोमवार, 8 सितंबर 2014

कब हटेगा कोहरा, कब छटेगी धुंध


मौन
असंख्य शब्द आ और जा चुके हैं
तुम्हारे और मेरे बीच
मगर फिर भी हम वह नहीं कह सके
जिसके बाद मौन भी एक भाषा बन जाता है


बंदिशें
न जाने बंदिशों की कैद में हू मैं
या मेरे ही मन ने कैद कर लिया है बंदिशों को
अपनी परवाह नहीं रही अब
चाहती हूं कि
ये बंदिशें आजाद हों


संभावना
कहीं कुछ रहे न रहे
कोरे कागज पर हमेशा
शेष रहेंगी
संभावनाएं।


संवेदना
इच्छाओं के बाजार में
सरेआम
बेहद गिरे हुए दामों पर
बेची जा चुकी हैं संवेदनाएं
दिखाने और जताने को हैं सिर्फ सिसकियां
आह...
ओह...
ओहो...
आदि-आदि।


शुक्रवार, 4 जुलाई 2014

मेरे समय की औरत

[ फेम‌िन‌िज्म या नारीवाद मेरे ल‌िए बेहद असहज कर देने वाले शब्द हैं। मेरा ‌इन शब्दों से कोई वास्ता नहीं है। मुझे ये मानने में भी कोई गुरेज नहीं है ‌क‌ि औरत और आदमी के बीच फर्क है। औरत और आदमी एक बराबर नहीं है। मगर बावजूद इसके औरतें आदम‌ियों की इस दुु‌न‌िया में अपनी जगह बना रही हैं बराबरी के साथ ये अच्छी और गौर करने वाली बात है। इसी मुद्दे पर एक बार ‌क‌िसी ने पूछा था क‌ि अपने समय की औरत को कैसे च‌ित्र‌ित करोगी तो इस तरह कुछ ‌ल‌िखा था-----]



मेरे पास एक कहानी है। इस कहानी में दो किरदार हैं। पहला किरदार है एक लड़की और दूसरा किरदार निभा रहे हैं कुछ दूसरे लोग। 

कहानी कुछ यूं है- 

घर-परिवार की उम्मीदों पर पानी फेरते हुए वह लड़की जन्म ले चुकी है। लड़की होने की पहली सजा उसे ये मिली है कि उसके पैदा होने की खुशी में खुश होने वाला सिवाय उसकी मां के कोई नहीं है। मां खुश है क्योंकि वह मां बन गई है। वह अपनी बेटी को प्यार करती है। उसे हर वो खुशी देने की कोशिश करती है, जो उसे नहीं मिली। ‘’जमाना बदल रहा है। लड़का और लड़की में क्या फर्क करना।‘’ मां ये बात अच्छे से समझती है। मां कभी ये नहीं कहती कि काश मेरा एक बेटा होता। पिता को हमेशा ये अफसोस रहता है कि वह एक बेटे के बाप नहीं बन सके। इन्हीं विरोधाभासों में लड़की बड़ी हो रही है। मां की छाया और बाप की बंदिशों ने उसे लड़की की तरह रहना तो सिखा दिया है मगर वह जीना अपनी तरह चाहती है। 
उसे कुछ बनना है। 
वह खूब पढ़ना चाहती है।
अपने पैरों पर खड़े होना चाहती है।
 नाम कमाना चाहती है।
 पैसा कमाना चाहती है। 
दुनिया की सैर करना चाहती है।
 वह किसी को बेइंतहा मोहबब्त करना चाहती है।
 वह जीना चाहती है अपनी तरह...
उसने शुरुआत कर दी।


वह पढ़ने गई। 
कॉलेज से घर के रास्ते में कुछ अवारा लड़के उसके पीछे लग गए। कॉलेज छुड़वा दिया गया।

वह नौकरी करने लगी। 
बॉस ने उसे गलत नजरों से देखना शुरू कर दिया। नौकरी छोड़ दी गई।

उसे एक लड़के से प्यार हो गया। 
लड़के ने उसके प्यार का फायदा उठाकर उसके साथ जबरदस्ती की। प्यार पर पछता लिया गया।

उसकी शादी कर दी गई। 
उसके पति ने बिना उसके मन और मर्जी को अहमियत दिए उसके शरीर पर अपना हक जमा लिया। उसे आदत हो गई। 

जिंदगी उसकी चाहतों से कहीं दूर निकल चुकी थी। मगर कुछ था उसके पास जो उसे गाहे-बगाहे फिर-फिर उन चाहतों के किनारे पर पहुंचा दिया करता था। वह दुनिया और समाज के तौर-तरीकों पर चलकर देख चुकी थी। उसने अपने तौर तरीके बनाने शुरू किए। 
ये एक नई लड़की का जन्म था। 

उस लड़की ने पढ़ाई शुरू की।
रास्ते में पीछा करने वालों को गाली बकी और चप्पल उतार कर भी मारी। और एक दिन उन्हीं लड़कों ने उसके मुंह पर तेजाब फेंक दिया।

वह नौकरी करने लगी। 
बॉस ने उसे गलत नजरों से देखा तो उसने साफ-साफ कह दिया कि वह अपनी नजरें सही करे। उसे नौकरी से हाथ धोना पड़ा।

वह पूरे मन से एक लड़के से प्यार करने लगी। 
लड़का उसके शरीर से प्यार करना चाहता था। उसने विरोध किया। उसका बलात्कार कर लिया गया। 

उसकी शादी कर दी गई। 
उसके पति ने जब हर दिन बिना उसके मन और मर्जी को अहमियत दिए उसके शरीर पर अपना हक जमाना शुरू कर दिया तो उसने एक दिन अपने पति से कहा कि उसका मूड नहीं है। पति ने उसे बेवफा समझ लिया।


अब वही लड़की एक बार फिर नया जन्म ले रही है।
मर्दों की बुरी नजर ने उसे बेशक मजबूर कर दिया है कि वे उन्हें नजरअंदाज करे।
तेजाब से झुलसे चेहरे की आग में वह बेशक आज भी जल रही है। 
बेशक बलात्कार ने उसके शरीर ही नहीं आत्मा को भी झकझोर दिया है।
और यह बात भी साफ है कि परिवार और पति के बेवजह के तानों ने उसके दिल को चकनाचूर कर दिया है। 

मगर वह हारेगी नहीं। टूटेगी नही। छिपेगी नहीं, न ही छिपने देगी। वह सामने आएगी और सामने लाएगी उन्हें जिन्होंने उसके वजूद पर बार-बार प्रहार किया है। 

मेरे ख्याल में यही है मेरे समय की औरत
हमारे समय की औरत 
बनती हुई औरत
बढ़ती हुई औरत

सोमवार, 12 मई 2014

पंडित जी जानते हैं कौन बनेगा प्रधानमंत्री !

इस समय का सबसे बड़ा सवाल है- देश का प्रधानमंत्री कौन बनेगा?
कुछ दिन पहले जब मुझसे किसी ने ये सवाल पूछा तो मैंने कहा- मुझे क्या पता?
मेरी तो वैसे भी राजनीतिक समझ काफी कम है।
उसने कहा- क्यों तुम्हें तो मालूम होना चाह‌िए, मीडिया में हो। पत्रकार हो। कुछ तो विश्लेषण किया होगा…
ठीक उसी वक्त लगा कि पत्रकार होकर ये मालूम न होना कि देश का प्रधानमंत्री कौन बनेगा? घोर अयोग्यता है।
तब से कोशिश कर रही हूं कि राजनीति और राजनेताओं को गंभीरता और गहराई से समझ सकूं।
मगर आज तक जबकि इस सवाल का जवाब सामने आने में कुछ ही दिन बाकी हैं, मेरे पास इस सवाल का कोई सटीक जवाब नहीं है। आंधी और लहर के बीच कहीं बारिश होती तो शायद…
वैसे भी इस लोकतांत्रिक रंगमंच के क्लाइमेक्स में कब क्या हो जाए, भला किसे पता…
इसल‌िए मैं कोई भी जवाब देकर रिस्क नहीं लेना चाहती
मुझे अपनी इमेज की बहुत चिंता है … जवाब गलत निकला तो…
और राजनीति को लेकर मेरी कोई निजी और कट्टर विचारधारा भी नहीं है, कि जल्दी से ‌उसकी ओठ में खुद को छिपा लूं।
फिर कुछ दिन बाद यही सवाल मैंने किसी से पूछा- आपको क्या लगता है देश का प्रधानमंत्री कौन बनेगा?
जिनसे मैंने ये सवाल पूछा उन्हें पत्रकारिता का लंबा अनुभव है और ऐसे कई लोकसभा चुनाव वह देख चुके हैं, कवर कर चुके हैं…उनसे सवाल के तुरंत बाद एक तुरत जवाब की अपेक्षा थी, मगर उन्होंने टीवी पर एक राजनीतिक भाषण सुनते हुए एक नजर मेरी तरफ देखा और वापस उस भाषण की ओर मुड़ते हुए दोनों हाथ पेंट की जेब में डालते हुए बेहद अनमने अंदाज में कहा- कुछ नहीं कहा जा सकता, मोदी की लहर है, कांग्रेस की तो नहीं बनने वाली इस बार
लेकिन तीसरे मोर्चे जैसा भी कुछ हो सकता है।
वाह… जवाब न मिलने के दुख से ज्यादा मुझे इस बात की खुशी थी कि इतने अनुभवी व्यक्ति के पास भी मुझ जैसी अपेक्षाकृत काफी कम अनुभव वाली पत्रकार की तरह कोई सधा हुआ और ठीक-ठीक जवाब नहीं है।
ठीक भी है आखिर पत्रकार हैं कोई अंतर्यामी तो नहीं…
फिर गाहे-बगाहे कई बार कई लोगों के साथ इस सवाल की चर्चा हुई। किसी ने अपनी निजी विचारधारा में लपेटकर जवाब दिया और किसी ने कई तरह के कयास लगा दिए…‌कोई ऐसा व्यक्ति नहीं मिला जिसने ‌क‌िसी पूर्वाग्रह के ‌ब‌िना अपनी समझ और आत्मविश्वास से एक सधा हुआ जवाब दिया हो।
‌ल‌िहाजा मैं ये मानकर संतुष्ट हो गई कि इस समय के इस सबसे बड़े सवाल का सही और सटीक जवाब सिर्फ समय के ही पास है और समय का इंतजार करने लगी…वैसे भी राजनीति इस नॉट माई कप ऑफ टी…मगर नहीं…जब टी स्टॉल से लेकर कॉमन टॉयलेट्स तक लोग एक-दूसरे से इसी सवाल पर चर्चा कर रहे हों तो राजनीति की चाय पीने से कब तक बचा जा सकता था…
मन अंशात हो तो कभी-कभी मंदिर जाकर शांति मिलती है।
मैं कुछ दिन पहले मंदिर गई…दहलीज पर हाथ लगाकर माथे से छुआया
अंदर दाखिल हुई…मंदिर की घंटी बजाई
और उस घँटे की आवाज अभी कान में गूंज ही रही थी, मैंने आंखें बद करते हुए प्रार्थना में हाथ जोड़े ही थे कि फिर वही सवाल सुनाई दिया…
एक अंकल जी, जो मेरे पीछे-पीछे मंदिर के अंदर आए थे, ने पंडित जी के चरण स्पर्श करते हुए पूछा—– और पंडित जी किसकी सरकार बन रही है इस बार….
पंडित जी ने आर्शीवाद का हाथ उनके सिर पर रखते हुए …पूरे आत्मविश्वास के साथ जवाब दिया….- मोदी की बनेगी भाई साहब, ग्रह बोल रहे हैं उनके…
इस जवाब के मिलने के बाद मंदिर में मिलने वाली शांति मुझे नहीं मिली…मैंने औपचारिकता के तहत पूजा पूरी की और अपनी तयशुदा प्रार्थनाओं की लिस्ट भी मैं लगभग भूल गई…मुझे याद आ रहा था तो बस इतना कि राजनीति समझने के लिए नेता और पार्टी की हिस्ट्री पढ़ना, उनके भाषण सुनना, उनके मेनिफेस्टो को परखना और उनकी इमेज पर रिसर्च करना कितना नाकाफी था…ज्योतिष इस दुनिया में ‌कितनी बड़ी चीज थी..ग्रह नक्षत्र कितने अहम एलीमेंट थे सिर्फ लोगों की जिंदगी के ही नहीं, देश का भविष्य भी अब ग्रहों के हाथ में था..,
अब जब जिस देश में राजनीतिक दल शुभ महूरत देखकर घोषणाएं करें, नेता अपने लक्की पेन से साइन करें…तो सिर्फ पंडित ही सही और सटीक जवाब दे सकते थे..कि सरकार किसकी बनेगी…फिर मुझे याद आया चुनावों की सुगबुगाहट जिस वक्त शुरू ही हुई थी तब भी एक पंडित जी की भविष्यवाणी खबरों में छाई रही थी उन्होंने बाकायदा बताया था-
मोदी जी इतनी तारीख को इतने बजकर इतने मिनट पर प्रधानमंत्री पद की शपथ लेंगे।
काश पंडित जी बता पाते ग्रह नक्षत्रों की चाल देखकर कि कब इस देश की राजनीति धर्म और जाति मुक्त होगी, कौन-सी तारीख से पार्टियों के मेनीफेस्टो में दर्ज हर वादे को अपने तय कार्यकाल में पूरा किया जा सकेगा….घड़ी में कितने बजने से कितने मिनट पर इस देश में एक ऐसा पल आएगा जब लोग ”राजनीति” नामक शब्द के बारे में अच्छी और सकारात्मक सोच रख सकेंगे…अपने रहनुमाओं पर भरोसा कर सकेंगे…और…$$$$$$$$ ल‌िस्ट काफी लंबी है…
पंडित जी इतना ही बता सकें तो काफी होगा…फिलहाल के लिए…